बिहार में छात्र आंदोलन के दौरान AK-47 से फायरिंग के आरोप और पेपर लीक के मुद्दे को लेकर RJD ने बुधवार को सड़क पर उतरकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. गांधी मैदान के जेपी गोलंबर से लोक भवन तक निकले इस मार्च की अगुवाई तेजस्वी यादव ने की.
मार्च को पुलिस ने इनकम टैक्स गोलंबर के पास रोक दिया. इस दौरान आंदोलनकारियों पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया. तेजस्वी यादव समेत RJD के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। बाद में सभी को छोड़ दिया गया.
लेकिन यह मार्च सिर्फ पेपर लीक और छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं था. इसके पीछे RJD की राजनीति को लेकर कई बड़े सवाल भी जुड़े हैं. आखिर पांच साल से ज्यादा समय बाद तेजस्वी यादव को फिर सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों महसूस हुई? और RJD के लिए यह मार्च इतना अहम क्यों माना जा रहा है?
11 साल बाद RJD ने किया राजभवन मार्च
RJD ने करीब 11 साल बाद राजभवन मार्च का आयोजन किया. पार्टी ने इससे पहले 2015 में राजभवन मार्च किया था. तब लालू यादव की पार्टी ने 2011 की जनगणना से जुड़ी जातीय गणना की रिपोर्ट जारी करने की मांग उठाई थी.
इसके बाद लंबे समय तक RJD सत्ता और विपक्ष की राजनीति के बीच सक्रिय रही. लेकिन इस तरह का बड़ा सड़क आंदोलन देखने को कम मिला.
इस लिहाज से बुधवार का मार्च पार्टी के लिए सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं था. यह कार्यकर्ताओं के बीच फिर से संघर्ष का माहौल बनाने की कोशिश भी माना जा रहा है.
तेजस्वी भी लंबे समय बाद सड़क पर उतरे
तेजस्वी यादव लगातार सरकार पर हमला बोलते रहे हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पोस्ट और मीडिया बयानों के जरिए वह सरकार को घेरते रहे हैं. हालांकि, पैदल मार्च करते हुए सड़क पर उतरने का उनका ऐसा तेवर लंबे समय बाद दिखा.
इससे पहले मार्च 2021 में तेजस्वी एक प्रस्तावित कानून के विरोध में सड़क पर उतरे थे. उस दौरान भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था. विधानसभा में विपक्षी विधायकों के साथ हुई कथित बदसलूकी को लेकर भी उस समय काफी विवाद हुआ था.
RJD के आंदोलन का इतिहास लंबा है
ऐसा नहीं है कि RJD ने आंदोलन की राजनीति पूरी तरह छोड़ दी थी. तेजस्वी यादव अलग-अलग मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाते रहे हैं. मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के खिलाफ 2018 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर विपक्षी नेताओं को जुटाने की पहल भी तेजस्वी ने की थी.
इसके अलावा जनादेश अपमान यात्रा, आरक्षण बढ़ाओ यात्रा, बेरोजगारी हटाओ यात्रा, जन विश्वास यात्रा और वोटर अधिकार यात्रा के जरिए भी उन्होंने सड़क की राजनीति की है.
पिछले साल बिहार बंद और SIR के मुद्दे पर हुए आंदोलन में भी RJD सक्रिय रही थी. लेकिन पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में लंबे समय तक संघर्ष का जोश बनाए रखने वाला कोई बड़ा आंदोलन नहीं दिखा.
यही वजह है कि बुधवार का मार्च RJD के लिए संगठन और कार्यकर्ताओं के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है.
तेजस्वी को अब सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी?
यह सबसे बड़ा सवाल है.
तेजस्वी यादव की राजनीति को लेकर पिछले कुछ समय से यह धारणा बनती रही है कि वह सड़क के संघर्ष से ज्यादा बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए सरकार को घेरते हैं. अब बदले राजनीतिक माहौल में यह तरीका शायद पर्याप्त नहीं दिख रहा.
युवाओं की राजनीति में विरोध का अंदाज भी बदल रहा है. नई पीढ़ी आक्रामक तरीके से अपनी बात रखने वाली राजनीति की तरफ आकर्षित हो रही है.
ऐसे में तेजस्वी के लिए भी यह जरूरी हो गया है कि वह खुद को सिर्फ राजनीतिक वारिस की छवि तक सीमित न दिखाएं. सड़क पर उतरकर संघर्ष करने का संदेश देने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
बांकीपुर उपचुनाव ने RJD की चिंता बढ़ाई
तेजस्वी के मार्च की दूसरी बड़ी वजह बिहार की बदलती चुनावी राजनीति भी है.
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत और RJD का तीसरे नंबर पर पहुंचना पार्टी के लिए एक अहम राजनीतिक संकेत है.
यह नतीजा इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि बांकीपुर को पारंपरिक रूप से सवर्ण मतदाताओं के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है. ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत ने RJD के सामने एक नए राजनीतिक समीकरण की संभावना खड़ी कर दी है.
RJD का पारंपरिक आधार यादव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत माना जाता रहा है. लेकिन अगर तीसरा राजनीतिक विकल्प इन दोनों के बाहर भी जगह बनाने लगा, तो आने वाले समय में RJD के सामने चुनौती बढ़ सकती है.
प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में तीसरा कोण बनाया
बिहार की राजनीति लंबे समय से मुख्य रूप से दो बड़े खेमों के आसपास घूमती रही है. एक तरफ NDA और दूसरी तरफ RJD के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने इस समीकरण के बीच तीसरे विकल्प की चर्चा तेज कर दी है.
बांकीपुर की जीत ने इस चर्चा को और मजबूत किया है. अब प्रशांत किशोर विधानसभा में पहुंच चुके हैं और 2030 के चुनाव को लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं.
ऐसे में RJD के लिए चुनौती सिर्फ सरकार को घेरने की नहीं है. उसे अपने पारंपरिक वोट बैंक और कार्यकर्ताओं को भी मजबूती से अपने साथ बनाए रखना है.
सिर्फ ‘जंगलराज’ के मुद्दे से चुनावी लड़ाई आसान नहीं?
बिहार की राजनीति में लंबे समय से RJD को घेरने के लिए लालू यादव और ‘जंगलराज’ का मुद्दा इस्तेमाल होता रहा है. लेकिन जन सुराज के उभार ने इस पुराने राजनीतिक फॉर्मूले पर भी सवाल खड़े किए हैं.
अगर मतदाताओं के सामने तीसरा विकल्प मजबूत होता है, तो सिर्फ पुराने राजनीतिक मुद्दों के सहारे चुनावी मुकाबला आसान नहीं रहेगा. BJP और RJD दोनों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है.
RJD के सामने दोहरी चुनौती
बुधवार का राजभवन मार्च इसी बदलते राजनीतिक माहौल में हुआ है.
एक तरफ तेजस्वी यादव को सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्ष की भूमिका निभानी है. दूसरी तरफ पार्टी के कार्यकर्ताओं में यह भरोसा पैदा करना है कि RJD सड़क पर संघर्ष करने वाली पार्टी भी है.
इसके साथ ही प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के बढ़ते प्रभाव का जवाब भी तलाशना है.
यानी मार्च का मुद्दा भले ही छात्र आंदोलन और पेपर लीक हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने इससे कहीं बड़े हैं.
RJD ने बताया- सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए मार्च
RJD नेताओं के मुताबिक यह मार्च सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए किया गया.
उनका कहना है कि प्रदर्शनकारियों से संवाद करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है. उन्होंने छात्र आंदोलन के दौरान AK-47 के इस्तेमाल के आरोप को गंभीर बताते हुए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की.
RJD का कहना है कि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी पर सरकार को जवाब देना चाहिए. नियमित और निष्पक्ष परीक्षा के साथ समय पर परिणाम जारी होना जरूरी है.
असली संदेश क्या है?
तेजस्वी यादव का यह मार्च सरकार के खिलाफ विरोध से आगे की कहानी है.
यह RJD की ओर से अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का प्रयास है. साथ ही तेजस्वी अपनी उस छवि को बदलने की कोशिश करते दिख रहे हैं, जिसमें उन्हें सिर्फ बयान देने वाले नेता के तौर पर पेश किया जाता है.
दूसरी तरफ प्रशांत किशोर की राजनीति ने बिहार में तीसरे विकल्प की चर्चा को हवा दी है. ऐसे में तेजस्वी के सामने अब सिर्फ सत्ता पक्ष से मुकाबला करने की चुनौती नहीं है.
उन्हें अपनी पार्टी का आधार मजबूत रखना है, युवाओं को जोड़ना है और कार्यकर्ताओं में संघर्ष का भरोसा वापस लाना है.
यही वजह है कि पांच साल से ज्यादा समय बाद सड़क पर उतरे तेजस्वी यादव का यह मार्च RJD के लिए एक सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है.










