रांची. सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वह राज्य के स्वामित्व वाले पांच बंद हो चुके निगमों के हर संबंधित दिहाड़ी कर्मी और मजदूर को एकमुश्त एक-एक लाख रुपये का मुआवजा भुगतान करें.
साथ ही कोर्ट ने देर से दिये जाने वाले ईपीएफ बकाया पर सालाना 12% साधारण ब्याज देने को कहा है. इसके साथ ही देर से दिये जाने वाले वेतन और मजदूरी व अन्य मौद्रिक बकाया पर छह प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया है. इसकी गणना राशि देय होने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक होगी. यह ब्याज संबंधित कर्मियों या, जहां लागू हो, उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को दिया जायेगा. राज्यों को इस ब्याज समेत भुगतान को तीन महीने में देने का निर्देश दिया गया है. उक्त फ़ैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया.
कर्मचारियों की जानकारी सबके सामने लाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता के लिए बिहार और झारखंड सरकार को सभी कर्मियों और कामगारों की ताज़ा जानकारी चार हफ़्ते में सबके सामने लाने का भी निर्देश दिया है. यह जानकारी राज्यों के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग तथा संबंधित प्रशासनिक विभागों की वेबसाइट पर चार हफ़्ते में प्रकाशित करनी होगी.
बिहार पुनर्गठन अधिनियम से शुरू हुआ था विवाद
कोर्ट ने बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 से शुरू हुए उस विवाद को ख़त्म कर दिया, जो झारखंड गठन के बाद राज्य के स्वामित्व वाले पांच बंद हो चुके निगमों के कर्मियों और मजदूरों के बकाया दायित्वों से जुड़ा था. साथ ही कोर्ट ने वह विवाद ख़त्म किया.
इधर झारखंड हाइकोर्ट में बीएसआइडी कामगार यूनियन सहित अन्य याचिकाओं पर लंबे समय से सुनवाई चल रही है. सुप्रीम कोर्ट में मामला सुने जाने के कारण हाइकोर्ट ने जनहित याचिका की सुनवाई के लिए पांच नवंबर की तारीख तय की है.
बीएसआइडीसी के पांच बंद कारखानों के लगभग 600 कर्मियों का मामला लंबित है. इसमें झारखंड में स्थित इइएफ इलेक्ट्रिक इक्विपमेंट फैक्ट्री, हाइटेंशन इंसुलेटर फैक्ट्री और स्वर्णरेखा घड़ी कारखाना के कर्मियों का मामला भी जुड़ा हुआ है. अब सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फ़ैसले का असर संबंधित कर्मियों के मामलों पर भी पड़ेगा.
598 दैनिक वेतनभोगियों का मामला
सबसे अहम आदेश बिहार स्टेट कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन के 598 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों/कामगारों से संबंधित है. इनके बकाये की गणना 1992 से संबंधित कर्मी की सेवानिवृत्ति, मृत्यु या सेवा की औपचारिक समाप्ति तक 42.50 रुपये रोज़ की दर से की गयी थी. इस आधार पर 467 दैनिक वेतनभोगियों को 14.21 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है. पीठ ने कहा कि कई दशकों तक 42.50 रुपये रोज़ की एक ही दर से बकाये की गणना करना ठीक नहीं माना जा सकता.
ऐसे में कोर्ट ने हर संबंधित दैनिक वेतनभोगी को अतिरिक्त एक लाख रुपये एकमुश्त देने का रास्ता अपनाया. 598 कर्मचारियों पर यह रकम लागू होने पर अतिरिक्त भुगतान 5.98 करोड़ रुपये तक होगा. यह मामला बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के बाद बिहार से अलग होकर झारखंड बनने के दौरान पांच राज्य स्वामित्व वाली कंपनियों के कर्मचारियों के वेतन, सेवा संबंधी दावों और अन्य बकाये के बंटवारे से जुड़ा है.
ये पांच निगम हैं शामिल
बिहार राज्य निर्माण निगम लिमिटेड
बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड
बिहार राज्य इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम लिमिटेड
बिहार राज्य वन विकास निगम लिमिटेड
बिहार राज्य पंचायती राज वित्तीय निगम लिमिटेड










