क्या एक झूठा आरोप किसी इंसान से उसकी आज़ादी, करियर और सपनों को छीन सकता है? बिहार के अरवल जिले के चंदन कुमार सिंह की कहानी इस सवाल का दर्दनाक जवाब देती है।
सीमित संसाधनों और रोजगार की कमी के बीच अरवल के एक साधारण परिवार से निकलकर चंदन ने बेहतर भविष्य की तलाश में मर्चेंट नेवी का रास्ता चुना। परिवार की जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठाते हुए वे एक निजी कंपनी के जहाज पर काम करने मुंबई से वेस्टइंडीज के त्रिनिदाद एंड टोबैगो पहुंचे। उन्हें लगा कि अब संघर्ष के दिन पीछे रह जाएंगे।
लेकिन यही सफर उनके लिए जिंदगी की सबसे कठिन परीक्षा बन गया। जहाज पर भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद होने के बाद पुलिस ने तीन कर्मचारियों को गिरफ्तार किया – दो भारतीय और एक विदेशी। जांच में स्पष्ट था कि ड्रग्स केवल एक व्यक्ति से बरामद हुई थी, फिर भी चंदन को भी आरोपी बना जेल भेज दिया गया।
एक निर्दोष व्यक्ति।
एक झूठा आरोप।
और 4 साल 8 महीने की कैद।
इन वर्षों में पुलिस और जांच एजेंसियों ने चंदन के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया। अनजान देश, अलग भाषा, लंबी कानूनी प्रक्रिया और जेल की सलाखों के पीछे बीता हर दिन उनके लिए एक अंतहीन सजा जैसा था।
चंदन बताते हैं कि जेल के शुरुआती दो सालों में उन्होंने रिहाई की उम्मीद लगभग छोड़ दी थी। नींद की दवाइयों पर निर्भर हो गए। भारत में उनका परिवार भी सोच चुका था कि शायद उनका बेटा अब कभी लौट नहीं पाएगा। मां की आंखें रोज दरवाजे की ओर देखतीं, पिता की खामोशी में दर्द बोलता था, और घर के हर त्योहार अधूरे रह गए। लेकिन सच को कितनी भी देर तक दबाया जाए, वह हारता नहीं। आखिरकार, सबूतों के अभाव में विदेशी अदालत ने चंदन कुमार सिंह को निर्दोष करार दिया। 4 साल 8 महीने बाद जेल से बाहर निकलते ही यह पल उनके लिए नई जिंदगी की शुरुआत जैसा था।
भावुक होते हुए चंदन कहते हैं, न्याय मिलने में देर हुई, लेकिन सच की जीत हुई। चंदन की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि उन तमाम निर्दोष लोगों की आवाज है जो झूठे मामलों में फंसकर सालों तक सिस्टम के बोझ तले दबे रहते हैं।
बिहार के अरवल के एक साधारण युवक से लेकर विदेशी जेल की सलाखों तक, और फिर सम्मान के साथ आज़ादी तक यह कहानी याद दिलाती है कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, सच का सूरज एक दिन ज़रूर उगता है।
हज़ारीबाग से सुरेंद्र कुमार सिंह की रिपोर्ट










