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गोबर से सजेंगे घर, महिलाओं की मेहनत से जलेगा दीप – रोशन होगी हर घर की दिवाली

राजधानी रांची के कई हिस्सों में इस समय दीपावली की तैयारी अलग ही अंदाज में चल रही हैं. जहां एक ओर शहर के बाजारों में रंग-बिरंगी सजावट और लाइटिंग की रौनक है, वहीं दूसरी ओर सुकुरहुटू, चापूटोला अरसंडे और धुर्वा सीठियो जैसे इलाकों में महिलाओं के हाथों से हजारों दीये आकार ले रहे हैं. इन दीयों की खासियत यह है कि ये पूरी तरह गोबर से बने हैं. ये दीये न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की नई कहानी भी कह रहे हैं.
7 लाख गोबर के दीये बना रहीं 90 महिलाएं
इस वर्ष रांची में लगभग 7 लाख गोबर के दीये तैयार किए जा रहे हैं. सुकुरहुटू गोशाला, चापूटोला अरसंडे और धुर्वा सीठियों की 90 से अधिक महिलाएं इस काम में लगी हैं. दिवाली के पहले ही दिन से उत्पादन बढ़ाने के लिए हर स्थान पर मशीनें और सांचे लगाए गए हैं.महिलाएं सुबह से शाम तक समूह में काम करती हैं. कोई गोबर सुखाने का काम करती है, कोई पाउडर बनाने का, तो कोई रंगाई-पुताई में व्यस्त रहती है. इन महिलाओं को सारा प्रशिक्षण और कच्चा माल रांची गोशाला न्यास और गौ सेवा आयोग की ओर से दिया जा रहा है.
कैसे बनते हैं गोबर के दीये
दीया बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से वैज्ञानिक और स्वच्छ है. पहले गोबर को सुखाकर उसका बारीक पाउडर बनाया जाता है. फिर उसमें थोड़ा-सा ताजा गोबर और ‘प्री-मिक्स पाउडर’ मिलाया जाता है, जिससे मिश्रण गाढ़ा और टिकाऊ बनता है. यह मिश्रण मशीन में डालकर विभिन्न आकारों के सांचों में भरा जाता है. महिलाएं इस मिश्रण को हाथों से दबाकर दीये का आकार देती हैं. सूखने के लिए तैयार दीयों को तीन दिन तक धूप में रखा जाता है. दीयों के सूखने के बाद उन्हें हल्के प्राकृतिक रंगों से पेंट किया जाता है. एक महिला औसतन रोज 200 से 250 दीये तैयार कर लेती है. रांची गोशाला के सदस्य बताते हैं कि इस साल दीपावली के लिए 2.5 लाख दीयों का ऑर्डर केवल स्थानीय बाजार से मिला है, जबकि 2 लाख दीये बनारस भेजे जाएंगे. दीयों की कीमत आकार के अनुसार रखी गई है, छोटे दीये 2 से 3 रुपए, मध्यम आकार के 5 रुपए, और बड़े 7 से 10 रुपए तक.
कला, आस्था और पर्यावरण का संगम
धुर्वा के सीठियो गोशाला में 40 महिलाएं केवल साधारण दीये ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सजावटी वस्तुएं भी तैयार कर रही हैं. यहां ऊँ, जय श्रीराम, शुभ लाभ, जय हिंद जैसे संदेशों वाले दीयों के साथ-साथ श्री लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, पीपल के पत्तों पर गणेश जी और तोरण जैसे सजावटी आइटम बनाए जा रहे हैं.इन उत्पादों के निर्माण में गौशाला आयोग और गो-वर क्राफ्ट संस्था का संयुक्त सहयोग है. आयोग ने महिलाओं को सांचे, मशीनें और आवश्यक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया है, ताकि उत्पादों की गुणवत्ता बनी रहे और बाजार में उनकी मांग बढ़े.
गो-वर क्राफ्ट: एक विचार जिसने दिशा बदल दी
रांची के रौशन सिंह और सोनाली मेहता ने करीब पांच साल पहले गो-वर क्राफ्ट की स्थापना की थी. उनका उद्देश्य था गोसेवा को स्वरोजगार से जोड़ना. सोनाली मेहता बताती हैं कि शुरुआत में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लोगों को समझाना पड़ा कि गोबर कोई गंदगी नहीं, बल्कि उपयोगी संसाधन है. हमने महिलाओं को प्रशिक्षित किया कि इससे दीये, मूर्तियां, धूप और फिनाइल जैसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं. धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और आज यह पहल कई जिलों में फैल चुकी है. वर्तमान में 500 से अधिक महिलाएं इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हैं. इनमें से कई महिलाएं पहले बेरोजगार थीं, लेकिन अब अपने गांव में ही रोजगार पा रही हैं.
रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई दिशा
चापूटोला अरसंडे की महिलाओं का कहना है कि गोबर के दीये बनाना उनके लिए केवल काम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का जरिया बन गया है. यह काम महिलाओं को घर बैठे आर्थिक स्वतंत्रता दे रहा है. दीपावली के बाद भी उन्हें गोबर से अगरबत्ती, धूप, जैविक खाद, फिनाइल, गोकाष्ठ (गोबर की लकड़ी) और अन्य वस्तुएं बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इन उत्पादों की बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है.
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