रांची में किसानों को मिला साइलेज बनाने का प्रशिक्षण, पूरे साल मिलेगा पौष्टिक पशु चारा

Share this News:

रांची: भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-IIBA), गढ़खटंगा, रांची ने 1 और 2 जुलाई 2026 को अनुसूचित जाति उप-योजना के तहत दो दिवसीय प्रशिक्षण एवं अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम का आयोजन झारखंड स्टेट लाइवलीहुड्स प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) और झारखंड स्टेट को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स फेडरेशन लिमिटेड के सहयोग से किया गया।

इस प्रशिक्षण का विषय स्वीट कॉर्न (मक्का) के हरे चारे और फसल अवशेषों से साइलेज निर्माण था। इसमें नामकुम, बेरो और नगरी प्रखंड के 10 गांवों से कुल 52 पशुपालक किसानों ने भाग लिया, जिनमें 41 महिला किसान शामिल रहीं।

कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को हरे चारे के वैज्ञानिक संरक्षण की तकनीक सिखाना था, ताकि पूरे वर्ष पशुओं के लिए पौष्टिक चारा उपलब्ध कराया जा सके। वैज्ञानिकों ने बताया कि झारखंड में करीब 90 प्रतिशत हरे चारे की कमी है, जिसका सीधा असर पशुओं के स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन पर पड़ता है।

विशेषज्ञों ने बताया कि बेरो प्रखंड और लातेहार सहित कई इलाकों में बड़ी मात्रा में स्वीट कॉर्न और मक्का की खेती होती है। फसल से भुट्टा निकालने के बाद बचा हुआ हरा अवशेष अक्सर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है या कम कीमत पर बेच दिया जाता है। जबकि इसी अवशेष से वैज्ञानिक तरीके से साइलेज तैयार कर पूरे साल पौष्टिक पशु आहार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों को साइलेज बेलिंग मशीन, ड्रम साइलेज और बैग साइलेज जैसी तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही कम लागत में छोटे और बड़े स्तर पर साइलेज बनाने के तरीके भी बताए गए। वैज्ञानिकों ने बताया कि साइलेज से चारे की गुणवत्ता, पोषण क्षमता और पाचन क्षमता बढ़ती है, जिससे पशुओं की उत्पादकता में भी सुधार होता है।

यह कार्यक्रम संस्थान के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित और संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. विजय पाल व्हाडाना के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया। इस दौरान डॉ. सौमेन नस्कर, अडेराव गणेश एन., डॉ. सौमजीत सरकार, डॉ. अमित कुमार, डॉ. कनका के.के. और डॉ. सुजय बी. कडेमनी ने किसानों को वैज्ञानिक पशुपालन, हरे चारे के संरक्षण और साइलेज के जरिए आय बढ़ाने के उपायों की जानकारी दी।

कार्यक्रम के समापन पर किसानों ने साइलेज तकनीक को अपनाने और इसे आय का अतिरिक्त स्रोत बनाने में रुचि दिखाई। वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई कि इस तकनीक के व्यापक उपयोग से झारखंड में चारा संकट कम होगा, पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता में सुधार आएगा तथा किसानों की आय और पोषण सुरक्षा मजबूत होगी।

Share this News:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *