राँची: भाकृअनुप-भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-IIAB), राँची द्वारा भारत सरकार की राष्ट्रव्यापी पहल “खेत बचाओ अभियान-2026” के अंतर्गत संस्थान परिसर में एक व्यापक हितधारक बैठक का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम संस्थान के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।
बैठक में 120 से अधिक किसान, लगभग 15 कृषि इनपुट विक्रेता और विभिन्न जनप्रतिनिधियों, जिनमें मुखिया एवं ग्राम प्रधान शामिल थे, ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को अभियान के उद्देश्यों से अवगत कराया गया और मृदा स्वास्थ्य सुधार, कृषि लागत में कमी और दीर्घकालिक उत्पादकता सुनिश्चित करने हेतु सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने पर विशेष जानकारी दी गई।
इस अवसर पर डॉ. जयंत लायक, वरिष्ठ वैज्ञानिक, ने संरक्षण कृषि की तकनीकों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ढैंचा जैसी हरी खाद फसलें नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता को कम कर सकती हैं। उन्होंने किसानों को दलहनी फसलों की खेती, फसल चक्र और विविधीकरण अपनाने की सलाह दी। इसके अलावा, नैनो डीएपी और नैनो यूरिया जैसे तरल उर्वरकों तथा मृदा परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरक प्रबंधन के उपयोग से पोषक तत्वों की दक्षता बढ़ाने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
वहीं, डॉ. कार्तिक शर्मा, वैज्ञानिक, ने जैविक खेती के लाभ पर चर्चा करते हुए किसानों को नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र, बीजामृत, जीवामृत और घनजीवामृत जैसी जैविक तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि ये पर्यावरण-अनुकूल उपाय न केवल खेती की लागत घटाते हैं, बल्कि मृदा स्वास्थ्य, कृषि की स्थिरता और सुरक्षित खाद्य उत्पादन में भी सहायक हैं।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. सुजय रक्षित ने कहा कि इस प्रकार की बैठकों का उद्देश्य किसानों एवं जनप्रतिनिधियों के बीच जागरूकता बढ़ाना और खेत बचाओ अभियान को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करना है। उन्होंने संस्थान की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाकृअनुप-आईआईएबी, वैज्ञानिक तकनीक, प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम और क्षमता निर्माण गतिविधियों के माध्यम से अभियान को सफल बनाने में अहम योगदान दे सकता है।
इस अवसर पर किसानों के बीच सीआर-320 और सहभागी धान किस्मों के कुल 800 किलोग्राम बीज का वितरण भी किया गया। इस पहल का उद्देश्य झारखंड की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप उच्च उत्पादकता वाली और प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने वाली धान किस्मों को बढ़ावा देना है। किसानों को इन किस्मों की वैज्ञानिक खेती संबंधी जानकारी भी प्रदान की गई, ताकि उत्पादकता में वृद्धि, कृषि आय में सुधार और जलवायु संबंधी अनिश्चितताओं के प्रति अनुकूलन क्षमता बढ़ सके।










