पश्चिम सिंहभूम में दंतैल हाथी का कहर: 7 दिन में 17 मौतें, वन विभाग की ट्रैकिंग फेल

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पश्चिम सिंहभूम जिले में दंतैल हाथी लगातार ग्रामीणों की जान ले रहा है, लेकिन हालात पर काबू पाने के बजाय वन विभाग का तंत्र तमाशबीन बना नजर आ रहा है। कोल्हान और चाईबासा फॉरेस्ट डिवीजन की सात फॉरेस्ट रेंज में बीते सात दिनों के भीतर 12 अलग-अलग जगहों पर हाथी ने हमला किया, जिसमें 17 ग्रामीणों की मौत हो चुकी है और 10 लोग घायल हैं। हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े पैमाने पर जनहानि के बावजूद न तो हाथी की सटीक ट्रैकिंग हो सकी और न ही कोई ठोस रोकथाम व्यवस्था लागू की गई।

एक ही परिवार के चार लोगों की दर्दनाक मौत
सबसे भयावह घटना मंगलवार रात नोवामुंडी रेंज के बावड़िया गांव में सामने आई। यहां दंतैल हाथी ने पुआल से बने अस्थायी आश्रय में सो रहे एक ही परिवार पर हमला कर दिया। हाथी ने चार लोगों को कुचलकर मार डाला, जिनमें छोटे-छोटे मासूम बच्चे भी शामिल थे। इस घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत फैल गई है और ग्रामीण रात में घरों से निकलने से डर रहे हैं।

110 किलोमीटर में सर्कुलर मूवमेंट, फिर भी ट्रैकिंग फेल
जानकारी के अनुसार दंतैल हाथी करीब 110 किलोमीटर के दायरे में सर्कुलर मूवमेंट करते हुए लगातार हमले कर रहा है। अमराई, साईतबा, रोरो, वीरसिंहहातु, केंद्रकोचा, सुंआ, कुईलसुता, बावड़िया, उलीसाई और बड़ापासेया समेत 12 स्थानों पर वह हमला कर चुका है। 16 लोगों की मौत के बाद जाकर वन विभाग ने हाथी को ट्रैंकुलाइज करने का निर्णय लिया, लेकिन अब तक उसकी सटीक लोकेशन ट्रैक नहीं की जा सकी है। बंगाल से आई हाथी हरकारा टीम, स्थानीय वनकर्मी और ओडिशा से वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की टीम इलाके में तैनात है, इसके बावजूद हाथी पकड़ से बाहर है।

रात में हमला, दिन में जंगल में गायब, खतरा बढ़ा
1 से 7 जनवरी के बीच हाथी के हमलों का पैटर्न बेहद खतरनाक सामने आया है। हाथी केवल रात में ही गांवों में घुसकर हमला कर रहा है और दिन निकलते ही जंगल में छिप जा रहा है। वह एक जगह हमला करने के बाद रुकता नहीं, बल्कि आगे बढ़ता जाता है। रास्ते में पड़ने वाले वनग्रामों की झोपड़ियां, खलिहान और कच्चे घर उसके मुख्य निशाने बन रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवहार इस बात का संकेत है कि हाथी मस्त अवस्था में है, इसी कारण वह मानव बस्तियों से डर नहीं रहा और बार-बार सोते हुए लोगों पर हमला कर रहा है। दिन में हाथी का कहीं नजर न आना वन विभाग की ट्रैकिंग को और मुश्किल बना रहा है।

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